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लाल किताब की पृष्ठभूमि

भारतवर्ष की पृष्ठभूमि प्राचीन काल से ज्ञानवान रही है। यहां विभिन्न प्रकार के ऋषि मुनियों ने जन्म लिया है, जिन्होंने विभिन्न प्रकार की स्मृतियां, पुराण, ग्रंथ आदि की रचना की है। लाल किताब भी ज्योतिष की एक ज्योतिष का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। यह विद्या भारत के उत्तरांचल और हिमाचल क्षेत्र से हिमालय के इलाकों में फैली और बाद में इसका प्रचलन मैदानी क्षेत्रों में पंजाब आदि से होकर अफगानिस्तान तक होता रहा।

भारतीय वैदिक सभ्यता में कंठस्थ करने की आदत डाली जाती थी इसलिए इस प्रकार की समस्त विद्याएं एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी को कंठस्थ रूप से अग्रेषित की जाती थी। कुछ लोगों का मानना है की एक समय आकाश से आकाशवाणी भी होती थी जिससे किसी भी शुभ-अशुभ के घटित होने की सूचना प्राप्त होती थी इसी प्रकार इस ग्रंथ को एक पीढ़ी के लोगों ने लिपिबद्ध किया और तब धीरे-धीरे यह एक महान ग्रंथ बनने की ओर अग्रसर हुआ। वर्ष 1939 में जालंधर शहर पंजाब के निवासी पंडित रूप चंद जोशी ने इसको लिखा और तब से उनके नाम का संबंध लाल किताब से जोड़कर देखा जाता है।

पंडित रूप चंद जोशी ने इस किताब को लगभग 5 भागों में लिखा है अर्थात इस पुस्तक के पाँच संस्करण हैं जो कि निम्नलिखित हैं:-

1. लाल किताब के फरमान: यह पुस्तक वर्ष 1939 में प्रकाशित हुई।

2. लाल किताब के अरमान: यह पुस्तक वर्ष 1940 में प्रकाशित हुई।

3. लाल किताब (गुटका): यह पुस्तक वर्ष 1941 में प्रकाशित हुई।

4. लाल किताब: यह पुस्तक वर्ष 1942 में प्रकाशित हुई।

5 लाल किताब: यह पुस्तक वर्ष 1952 में प्रकाशित हुई।

यह सभी पांचों भाग अपने आप में पूर्ण रूप से संपूर्णता ग्रहण किए हुए हैं। इस पद्धति के नियम अन्य ज्योतिष पद्धतियों से कुछ भिन्नता लिए हुए हैं। यही इस किताब को एक महान ग्रंथ बनाते हैं। जिस कालखंड में इस पुस्तक की रचना हुई उस समय मुख्य रूप से उर्दू प्रचलन में थी। इस कारण पंडित रूप चंद जोशी ने इसकी रचना उर्दू में की ताकि आम बोलचाल में लोग इसको आसानी से समझ सकें और छोटे-छोटे उपाय द्वारा अपने जीवन की समस्याओं का निवारण कर सकें। लाल किताब का उर्दू भाषा से संबंध होने के कारण कुछ लोगों में भ्रांतियाँ भी हैं कि यह फारसी अथवा अरबी ग्रंथ है जो कि सर्वथा ग़लत है।

लाल किताब के सूत्रों का संबंध फलित ज्योतिष आम ज्योतिष की प्रसिद्ध धारणा से नहीं होकर विशेष रूप से सामुद्रिक, नाड़ी शास्त्र और हस्तरेखा जैसे विद्याओं से संबंधित है। इस पुस्तक का संबंध वास्तु-शास्त्र से भी माना जाता है। वास्तव में यह एक अनूठी पुस्तक है जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति उन छोटे-छोटे उपायों, टोटकों आदि के बारे में जानकर उन्हें प्रयोग कर सकता है और ग्रह दोषों से मुक्ति प्राप्त कर ग्रहों को अनुकूल बनाने का प्रयास कर सकता है।

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